इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बिना मान्यता मदरसा चलाना संवैधानिक अधिकार, प्रशासन की कार्रवाई अवैध।
लखनऊ | 19 जनवरी, 2026 |
मुख्य समाचार: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में मदरसा संचालन को लेकर एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने कहा है कि संविधान का अनुच्छेद 30(1) अल्पसंख्यकों को संस्थान चलाने का हक देता है, जिसे मान्यता न होने के बहाने छीना नहीं जा सकता।
प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने श्रावस्ती जिले के ‘मदरसा अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा’ की याचिका पर फैसला सुनाते हुए प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई मदरसा सरकार से वित्तीय सहायता नहीं ले रहा है, तो उसे मान्यता के अभाव में सील करना कानूनी तौर पर गलत और प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग है।
24 घंटे में सील खोलने का आदेश
अदालत ने श्रावस्ती जिला प्रशासन को आदेश दिया है कि उक्त मदरसे की सील 24 घंटे के भीतर हटाई जाए। ज्ञात हो कि इस संस्थान को मई 2025 में बिना मान्यता के संचालित होने के आरोप में बंद कर दिया गया था।
क्या हैं इस आदेश के प्रमुख बिंदु?
मौलिक अधिकार: अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार है।
सरकारी सहायता की शर्त: कोर्ट ने कहा कि जो मदरसे मान्यता नहीं रखते, वे सरकारी धन या मदरसा बोर्ड की आधिकारिक डिग्री का दावा नहीं कर सकते।
कानूनी आधार: सरकार ऐसा कोई कानून पेश नहीं कर सकी जो निजी तौर पर बिना मान्यता के चल रहे मदरसों को बंद करने की अनुमति देता हो।
हजारों मदरसों को मिली राहत
उत्तर प्रदेश में हालिया सर्वेक्षणों के बाद गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों पर कार्रवाई की तलवार लटक रही थी। इस फैसले के बाद, निजी तौर पर चलने वाले संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि इन मदरसों के छात्र बोर्ड परीक्षाओं में सीधे तौर पर शामिल नहीं हो सकेंगे।




