फिर बदलापुर!
लाडली बहनों के नारे, लेकिन लाडली बेटियों की सुरक्षा लापता !
स्कूल बस में बच्ची से दुष्कर्म की कोशिश, महाराष्ट्र की कानून व्यवस्था पर सवाल 🔥
24 जनवरी 2026 | मेराज उद्दीन सिद्दीकी|
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस बर्फ की धरती स्विट्ज़रलैंड में हैं। उद्देश्य है—महाराष्ट्र में विदेशी निवेश लाना। लेकिन उनके पीछे महाराष्ट्र में बलात्कारी और अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। कानून का डर खत्म हो चुका है और शासन की संवेदनहीनता उजागर हो रही है।
मुंबई हाई कोर्ट ने हाल ही में गोगावले मामले में मुख्यमंत्री के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए। यह टिप्पणी सिर्फ एक केस तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है।
मुंबई के पास स्थित बदलापुर शहर एक बार फिर दहल उठा है। एक मासूम चार साल की बच्ची के साथ स्कूल बस में यौन दुर्व्यवहार की कोशिश की गई। सवाल यह है कि क्या उस बच्ची की चीखें स्विट्ज़रलैंड में बैठे मुख्यमंत्री तक पहुँची होंगी?
दो साल पहले भी बदलापुर के एक स्कूल में दो स्कूली बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न हुआ था। तब आरोपी स्कूल का सफाईकर्मी था। अब वही व्यक्ति स्कूल बस चालक बनकर बच्चों के बीच पहुँच गया। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है—कानूनी औपचारिकताएँ पूरी हो गईं।
लेकिन मूल सवाल जस का तस है—महाराष्ट्र में ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों हो रही हैं?
चाहे स्कूल बसें हों या बच्चों को ले जाने वाली निजी वैन, यौन उत्पीड़न और लापरवाही की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं। हर घटना के बाद आरटीओ, ट्रैफिक पुलिस और सरकार सख्ती के दावे करती है। स्कूल प्रबंधन भी नियमों का पालन करने की कसमें खाता है।
लेकिन बदलापुर ने फिर साबित कर दिया कि ये सारे वादे सिर्फ़ लफ्फाज़ी हैं।
आज स्थिति यह है कि महाराष्ट्र में न बच्चे सुरक्षित हैं, न बहू-बेटियाँ। एक ओर स्कूली बच्चियाँ यौन शोषण का शिकार हो रही हैं, दूसरी ओर लड़कियों के लापता होने की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं।
सरकार को ‘लाडली बहनों’ के वोट चाहिए, लेकिन ‘लाडली बेटियों’ की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी नहीं।
बदलापुर पश्चिम के एक निजी स्कूल की बस में चालक ने दरिंदगी दिखाई। डरे-सहमे माता-पिता ने जब स्कूल की प्रधानाध्यापिका को जानकारी दी, तो मामले को दबाने की कोशिश की गई। जब स्कूल प्रशासन चुप रहा, तब मजबूर होकर माता-पिता को पुलिस के पास जाना पड़ा।
जांच में सामने आया कि जिस स्कूल बस में यह घिनौनी घटना हुई, उसके पास वैध परमिट तक नहीं था। न बस में महिला अटेंडेंट थी, जबकि सरकारी निर्देश स्पष्ट हैं। अब जाकर आरटीओ ने लाइसेंस रद्द किया और 24,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
लेकिन तब तक “चिड़िया चुग गई खेत”।
सरकारी एजेंसियाँ पहले सोती रहती हैं और घटना के बाद जागने का नाटक करती हैं। यही वजह है कि विकृत मानसिकता वाले लोग बेखौफ घूमते हैं।
इस अपराध को सिर्फ मानसिक विकृति कहकर टाला नहीं जा सकता। यह स्कूल प्रबंधन, आरटीओ, पुलिस और सरकार—सभी की सामूहिक विफलता है।
जब सत्ताधारी दल ही ऐसे लोगों को संरक्षण देगा, तो बच्चों के यौन शोषण करने वाले दरिंदे कानून से क्यों डरेंगे?
आज सवाल सिर्फ बदलापुर का नहीं है।
सवाल यह है कि महाराष्ट्र की लाडली बहनें और बेटियाँ आखिर सुरक्षित कब होंगी? बेटी पढ़ाओ और बेटी बचाओ का सिर्फ नारा है या इसका कुछ और मतलब है!




