भतीजे यश पाण्डेय का नाम चर्चा में आने और ब्राह्मण-ठाकुर कार्ड के बीच फंसी रायबरेली की सियासत का पूरा विश्लेषण:
राजनीतिक विश्लेषण | मेराज उद्दीन सिद्दीकी|
रायबरेली | 25 जनवरी 2026 |
उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘सत्ता के सेमीफाइनल’ कहे जाने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने लगी है। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘मिशन-2027’ के रास्ते में विपक्ष से ज्यादा अपनों की चुनौती भारी पड़ती दिख रही है। रायबरेली में भाजपा के दो दिग्गज—हाल ही में सपा छोड़ भाजपा में आए ऊंचाहार विधायक मनोज पाण्डेय और राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार दिनेश प्रताप सिंह—के बीच की तल्खी अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई है।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इन दोनों नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई रायबरेली में भाजपा के लिए ‘राहू-केतू’ जैसा संकट पैदा कर रही है। एक तरफ मनोज पाण्डेय ब्राह्मण चेहरे के रूप में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ दिनेश सिंह का जिला प्रशासन और संगठन पर पुराना प्रभाव है। हाल ही में मनोज पाण्डेय के भतीजे यश पाण्डेय का नाम विवादों में घसीटे जाने और पाण्डेय के खिलाफ रची गई कथित साजिश के खुलासे ने आग में घी डालने का काम किया है।
यदि भाजपा हाईकमान ने समय रहते इस गुटबाजी को नहीं रोका, तो 2027 में ‘कमल’ खिलने से पहले ही मुरझा सकता है।https://mulknamadaily.in/news/share-market-crash-sensex-nifty-loss-7-lakh-crore/
मनोज पाण्डेय और दिनेश प्रताप सिंह के बीच अनबन:
शीत युद्ध: रायबरेली में भाजपा के भीतर वर्चस्व की लड़ाई तेज हो गई है। सपा से भाजपा में आए ऊंचाहार विधायक मनोज पाण्डेय और राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह के बीच लंबे समय से चली आ रही प्रतिद्वंद्विता अब ‘शीत युद्ध’ में बदल चुकी है।
पुराना इतिहास: हालांकि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और अमित शाह ने दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश की थी, लेकिन स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण अब भी तनावपूर्ण हैं।
वोट बैंक का टकराव: ब्राह्मण और ठाकुर मतदाताओं के बीच अपना प्रभाव बनाए रखने की यह होड़ भाजपा के लिए चुनौती बनी हुई है।
यश पाण्डेय और मनोज पाण्डेय के खिलाफ ‘साजिश‘
ताजा विवाद (जनवरी 2026): हालिया रिपोर्टों के अनुसार, मनोज पाण्डेय के खिलाफ छवि खराब करने की एक साजिश का खुलासा हुआ है।
शिकायतकर्ता हिमांशु शुक्ला ने दावा किया है कि उसे मनोज पाण्डेय के खिलाफ झूठी शिकायत करने के लिए पैसे दिए गए थे और इसमें विधायक के भतीजे का नाम कथित तौर पर सामने आया है।
पारिवारिक संदर्भ: यश पाण्डेय, मनोज पाण्डेय के दिवंगत भाई राकेश पाण्डेय के बेटे हैं। यश का नाम पहले भी चर्चा में रहा है, विशेषकर अपने चाचा के साथ संबंधों को लेकर।
2027 के चुनाव पर संभावित प्रभाव ?
गुटबाजी का खतरा: रायबरेली में दिनेश प्रताप सिंह, मनोज पाण्डेय और अदिति सिंह जैसे कद्दावर नेताओं के बीच आपसी खींचतान भाजपा की संगठनात्मक शक्ति को कमजोर कर सकती है।
सपा-कांग्रेस का लाभ: यदि भाजपा की यह आंतरिक गुटबाजी 2027 तक जारी रहती है, तो इसका सीधा लाभ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को मिल सकता है, जो रायबरेली को अपना मजबूत गढ़ मानती हैं।
रायबरेली में चल रही यह “भीतरी जंग” निश्चित रूप से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘मिशन-2027’ के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
मुख्य बिंदु:
वर्चस्व की लड़ाई: मनोज पाण्डेय का कद भाजपा में आने के बाद बढ़ा है, जिससे पुराने भाजपाई खेमे (दिनेश सिंह गुट) में असुरक्षा की भावना पैदा हुई है।
जातीय समीकरण: रायबरेली परंपरागत रूप से ब्राह्मण बाहुल्य सीट रही है, जहाँ मनोज पाण्डेय का प्रभाव है। दिनेश सिंह का आधार ठाकुर मतदाताओं और ग्राम प्रधानों के नेटवर्क पर है।
यश पाण्डेय फैक्टर: यश पाण्डेय को लेकर हो रही चर्चाएं यह संकेत देती हैं कि विरोधियों द्वारा ‘पारिवारिक घेराबंदी’ की रणनीति अपनाई जा रही है।
पार्टी हाईकमान की चुप्पी: स्थानीय स्तर पर समन्वय की कमी और बड़े नेताओं का हस्तक्षेप न करना इस विवाद को हवा दे रहा है।
लब्बोलुआब: यदि रायबरेली में भाजपा को जीतना है, तो ‘एक घर में दो प्रधान’ वाली स्थिति को खत्म करना होगा, अन्यथा 2027 में कांग्रेस-सपा गठबंधन को यहाँ हराना असंभव हो जाएगा।




