क्यों टूटी ठाकरे की बीएमसी, और कैसे बदली मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति।
बीएमसी चुनाव 2026 के आईने में सत्ता, पहचान और अवसरवाद
सुजीत द्विवेदी
Political Analysis | Maharashtra & BMC Elections 2026 |मुंबई | 17 जनवरी 2026
मुंबई की राजनीति में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) महज़ एक नगर निकाय नहीं रही है। यह सत्ता का इंजन है, संसाधनों की चाबी है और उस राजनीतिक वैधता का प्रतीक है, जिसने दशकों तक ठाकरे परिवार को महाराष्ट्र की राजनीति में अप्रतिम शक्ति प्रदान की। बीएमसी पर नियंत्रण का अर्थ था—मुंबई की नब्ज़ पर हाथ।
जनवरी 2026 के नतीजों ने इस ऐतिहासिक सत्य को पहली बार निर्णायक रूप से चुनौती दी है। तीन दशकों तक जिस बीएमसी को शिवसेना का अभेद्य किला माना जाता रहा, वही किला इस बार ढह गया। और यह ढहना किसी एक चुनावी रणनीति की विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक आत्ममुग्धता, संगठनात्मक क्षरण और बदलते मुंबईकर की अनदेखी का परिणाम है।
बीएमसी हार: सिर्फ सीटें नहीं, प्रतीक टूटा
बीएमसी की 227 सीटों में बहुमत का आंकड़ा 114 है।
2026 में बीजेपी–शिंदे गठबंधन ने 118 सीटें जीतकर सत्ता हासिल कर ली, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) 65 सीटों पर सिमट गई।
यह हार केवल गणितीय नहीं है। यह उस राजनीति की हार है जो मानकर चल रही थी—
“मुंबई हमारी है, बीएमसी हमारी है।”
राजनीति में सबसे खतरनाक भ्रम यही होता है—स्थायित्व का भ्रम। जब कोई दल सत्ता को विरासत समझने लगता है, तो मतदाता उसे विकल्प में बदल देता है।
पार्टी नहीं टूटी, पहचान टूटी
शिवसेना का विभाजन काग़ज़ों पर संगठनात्मक था, लेकिन ज़मीन पर यह पहचान का विघटन था।
बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना को केवल एक पार्टी नहीं, बल्कि एक उग्र भावनात्मक, क्षेत्रीय और हिंदुत्ववादी आंदोलन के रूप में गढ़ा था। यह आंदोलन डर, गर्व और टकराव की राजनीति से चलता था।
उद्धव ठाकरे ने उसी विरासत को संयम, प्रशासन और शालीनता की भाषा में ढालने की कोशिश की—जो लोकतांत्रिक दृष्टि से सराहनीय थी, लेकिन शिवसेना के पारंपरिक कार्यकर्ता के लिए अपरिचित।
एकनाथ शिंदे की बगावत ने इसी असंतोष को आवाज़ दी।
नतीजा यह हुआ कि—
शाखा प्रमुख भ्रमित हुआ,
वार्ड कार्यकर्ता खामोश हुआ,
और मतदाता दुविधा में पड़ा।
‘असली शिवसेना’ की लड़ाई: अदालत से गली तक
बीएमसी जैसे चुनावों में चुनाव चिन्ह, नाम और भावनात्मक प्रतीक निर्णायक होते हैं। जब मतदाता के सामने दो शिवसेनाएं खड़ी हों—एक सत्ता के साथ और दूसरी स्मृतियों के साथ—तो शहरी मतदाता अक्सर स्मृति नहीं, सुविधा को चुनता है।
“असली शिवसेना कौन?”—यह सवाल भले अदालतों और चुनाव आयोग में तकनीकी रहा हो, लेकिन सड़क पर इसका जवाब बेहद व्यावहारिक निकला। सत्ता के साथ दिखने वाली राजनीति ज़्यादा विश्वसनीय लगी।
बदलता मुंबईकर, पुरानी राजनीति
मुंबई अब 1990 के दशक की मुंबई नहीं है।
आज का मुंबईकर—
मल्टी-लिंगुअल है
मोबाइल-ड्रिवन है
रोज़गार और ट्रैफिक से परेशान है
और भावनाओं से ज़्यादा डिलीवरी चाहता है
मराठी अस्मिता आज भी अहम है, लेकिन गड्ढे, लोकल ट्रेन, पानी, सुरक्षा और भ्रष्टाचार उससे कहीं ज़्यादा निर्णायक मुद्दे बन चुके हैं।
ठाकरे गुट इन सवालों पर भावनात्मक तो रहा, लेकिन आक्रामक और समाधान-केंद्रित राजनीति प्रस्तुत नहीं कर सका।
सत्ता से बाहर होना: अदृश्य लेकिन निर्णायक कारक
राजनीति में सत्ता सिर्फ कुर्सी नहीं होती—वह दृश्यता, संसाधन और भरोसे का स्रोत होती है।
बीजेपी और शिंदे गुट विकास का श्रेय लेते दिखे और प्रशासनिक मशीनरी के साथ खड़े नज़र आए।
इसके उलट ठाकरे गुट आरोप लगाता रहा, चेतावनी देता रहा, लेकिन ठोस विकल्प पेश नहीं कर सका।
नगर निकाय चुनावों में यही अंतर निर्णायक होता है।
सोशल मीडिया बनाम संगठन
ठाकरे गुट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं, सोशल मीडिया पर नैरेटिव बनाया और भावनात्मक वीडियो चलाए। लेकिन बीएमसी चुनाव यह सिखाते हैं कि—
चुनाव रील से नहीं, रिश्तों से जीते जाते हैं।
बीजेपी और शिंदे सेना ने वार्ड-वार्ड बैठकें कीं, स्थानीय मुद्दे उठाए और लगातार ज़मीनी मौजूदगी दिखाई। राजनीति केवल संदेश देने का खेल नहीं, निरंतर संपर्क का अभ्यास है।
बीजेपी की जीत: वैचारिक नहीं, व्यावहारिक
यह भी समझना ज़रूरी है कि बीजेपी की यह जीत पूरी तरह वैचारिक नहीं है। यह प्रबंधन, संसाधन और गठबंधन-राजनीति की जीत है।
बीजेपी ने शिंदे को चेहरा बनाया, अजित पवार गुट से तालमेल रखा और सत्ता की निरंतरता का नैरेटिव गढ़ा।
यह राजनीति कम भावनात्मक और ज़्यादा गणनात्मक थी—और मुंबई ने इसे स्वीकार किया।
अंत नहीं, चेतावनी
ठाकरे की बीएमसी हार को यदि केवल पराजय कहा जाए, तो यह अधूरा विश्लेषण होगा। यह दरअसल एक राजनीतिक चेतावनी है।
अगर ठाकरे गुट संगठन का पुनर्निर्माण करे, भावनात्मक विरासत को आधुनिक शहरी एजेंडे से जोड़े और सत्ता-विरोध को समाधान-आधारित राजनीति में बदले, तो मुंबई की राजनीति में उसकी वापसी असंभव नहीं।
बीएमसी की लड़ाई दरअसल भविष्य की शिवसेना की लड़ाई है—
और यही इसे एक साधारण चुनाव से कहीं अधिक विचारोत्तक बनाती है।




