संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार दिए, लेकिन 76 साल बाद भी सामाजिक सोच, सुरक्षा और आर्थिक बराबरी बड़ी चुनौती बनी हुई है ?
26 जनवरी 2026 |
मेराज उद्दीन सिद्दीकी|
भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। यह केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं था, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का घोषणापत्र भी था। सदियों से सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक बंधनों में जकड़ी भारतीय महिलाओं के लिए संविधान ने पहली बार यह स्पष्ट किया कि वे बराबरी की नागरिक हैं—किसी की कृपा पर नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में।
आज जब संविधान को लागू हुए 76 वर्ष से अधिक हो चुके हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या भारतीय महिलाओं का जीवन वास्तव में बदला है? क्या समानता केवल काग़ज़ों में सिमटी रही या ज़मीनी हक़ीक़त में भी उतरी? इस लंबे सफ़र में उपलब्धियाँ भी हैं, संघर्ष भी हैं और कई अधूरे वादे भी।
संविधान: महिलाओं के अधिकारों की आधारशिला:
स्वतंत्रता से पहले भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। शिक्षा सीमित थी, विवाह और संपत्ति पर अधिकार लगभग नहीं के बराबर थे और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी नगण्य थी। ऐसे समय में संविधान निर्माताओं ने महिलाओं को कानूनी समानता देकर ऐतिहासिक साहस दिखाया।
संविधान के अनुच्छेद 14 ने कानून के समक्ष समानता दी, अनुच्छेद 15 ने लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित किया, अनुच्छेद 16 ने सरकारी नौकरियों में समान अवसर की गारंटी दी और अनुच्छेद 21 ने महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान किया। यह पहली बार था जब राज्य ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि महिला होना किसी भी प्रकार की हीनता का आधार नहीं हो सकता।
कानूनों के माध्यम से सामाजिक बदलाव की कोशिश:
संविधान के बाद महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कानून बनाए गए। 1955 का हिंदू विवाह अधिनियम महिलाओं को विवाह और तलाक़ में अधिकार देता है। 1956 का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम संपत्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है। दहेज निषेध अधिनियम, मातृत्व लाभ अधिनियम, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा कानून—ये सभी महिलाओं के जीवन में सुरक्षा और सम्मान की भावना लाने के प्रयास हैं।
इन कानूनों ने यह स्पष्ट किया कि अब हिंसा, शोषण और भेदभाव को “घरेलू मामला” कहकर नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। हालांकि, कानून बनने और ज़मीन पर लागू होने के बीच की दूरी आज भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
शिक्षा: सबसे बड़ा परिवर्तन:
यदि किसी एक क्षेत्र में सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ है, तो वह है महिलाओं की शिक्षा। आज़ादी के समय महिला साक्षरता दर अत्यंत कम थी। लड़कियों को पढ़ाना सामाजिक रूप से अनावश्यक,अनुचित माना जाता था। लेकिन संविधान के बाद शिक्षा को अधिकार और विकास के औज़ार के रूप में देखा गया।
आज भारत में महिला साक्षरता दर 75 प्रतिशत से अधिक है। स्कूलों और कॉलेजों में लड़कियों की संख्या लगातार बढ़ी है। कई राज्यों में उच्च शिक्षा में छात्राओं की संख्या छात्रों से अधिक है। डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, पत्रकार और प्रशासनिक अधिकारी के रूप में महिलाएँ देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
हालाँकि, यह भी सच है कि ग्रामीण क्षेत्रों, आदिवासी समाज,अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में शिक्षा का लाभ अब भी समान रूप से नहीं पहुँच पाया है। किशोरावस्था में स्कूल छोड़ने की समस्या, बाल विवाह, रूढ़िवादी समाज और घरेलू जिम्मेदारियाँ आज भी लड़कियों की शिक्षा में बाधा हैं।
रोज़गार और आर्थिक स्वतंत्रता: अधूरा सपना:
संविधान ने महिलाओं को काम करने का अधिकार दिया, लेकिन आर्थिक समानता अब भी दूर की मंज़िल है। महिला श्रम भागीदारी दर पुरुषों की तुलना में काफ़ी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें से बड़ी संख्या असंगठित क्षेत्र में है—जहाँ वेतन कम, सुरक्षा नहीं और सामाजिक सम्मान भी सीमित है।
घरेलू काम, देखभाल और बच्चों की परवरिश का बोझ आज भी मुख्यतः महिलाओं पर है, जिसे “काम” ही नहीं माना जाता। कामकाजी महिलाओं को दोहरी ज़िम्मेदारी निभानी पड़ती है—घर भी और बाहर का काम भी।
सरकारी योजनाएँ, स्वयं सहायता समूह, मनरेगा और स्टार्टअप संस्कृति ने कुछ अवसर ज़रूर दिए हैं, लेकिन वेतन असमानता और करियर में ठहराव अब भी बड़ी चुनौतियाँ हैं।
राजनीति में भागीदारी: पंचायत से संसद तक संघर्ष:
संविधान लागू होने के बाद महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला—यह अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। लेकिन वास्तविक भागीदारी तब बढ़ी जब 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के तहत पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया।
आज देश की लाखों महिलाएँ सरपंच, पार्षद और प्रमुख के रूप में काम कर रही हैं। इससे नेतृत्व की नई पीढ़ी उभरी है और कई जगहों पर शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे मुद्दों पर सकारात्मक असर दिखा है। लेकिन व्यवहार में यह देखने को मिला है कि उन महिलाओं के नाम पर काम उनके पति कर रहे हैं!
फिर भी, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी आज भी 15 प्रतिशत के आसपास ही है। महिला आरक्षण विधेयक पारित हो चुका है, लेकिन इसके पूर्ण प्रभाव के लिए अभी इंतज़ार बाकी है।क्योंकि जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी !
सुरक्षा और न्याय:
सबसे बड़ी चुनौती संविधान ने महिलाओं को गरिमा और सुरक्षा का अधिकार दिया, लेकिन वास्तविकता यह है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा आज भी एक गंभीर सामाजिक संकट है। बलात्कार, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न और साइबर अपराध के मामले लगातार सामने आते हैं।
समस्या केवल अपराध की नहीं, बल्कि न्याय की धीमी प्रक्रिया और सामाजिक चुप्पी की भी है। कई महिलाएँ डर, बदनामी और दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करातीं। कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी और संवेदनशील क्रियान्वयन अब भी एक बड़ी चुनौती है।
रूढ़िवादी सामाजिक सोच: बदलाव की धीमी गति–संविधान कानून बदल सकता है, लेकिन मानसिकता बदलना समय लेता है।
पितृसत्तात्मक सोच:
बेटा-वरीयता, महिला की भूमिका को घर तक सीमित करने की प्रवृत्ति आज भी समाज में मौजूद है। कई जगहों पर महिलाओं की स्वतंत्रता, पहनावे, काम और निर्णयों पर सवाल उठाए जाते हैं।
हालाँकि, शहरीकरण, शिक्षा, मीडिया और महिलाओं की आवाज़ ने इस सोच को चुनौती दी है। आज महिलाएँ खुलकर सवाल पूछ रही हैं, अपने अधिकारों की माँग कर रही हैं और सामाजिक बदलाव की अगुआ बन रही हैं।
बहुस्तरीय असमानता:
हर महिला की कहानी एक जैसी नहीं !यह भी समझना ज़रूरी है कि सभी महिलाओं का अनुभव एक जैसा नहीं है। जाति, वर्ग, क्षेत्र, धर्म और आर्थिक स्थिति के आधार पर महिलाओं को अलग-अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दलित, आदिवासी, पिछड़ी, पहाड़ी , रूढ़िवादी, परम्परा अनुसर और गरीब महिलाएँ अक्सर दोहरे या तिहरे भेदभाव का शिकार होती हैं।
सफ़र लंबा है, लेकिन दिशा सही है:
1950 में लागू भारतीय संविधान ने महिलाओं को कानूनी पहचान और समानता का सपना दिया। पिछले सात दशकों में इस सपने को साकार करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है—शिक्षा, राजनीति, कानून और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है।
लेकिन यह भी सच है कि वास्तविक समानता अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुई है। जब तक महिलाओं को घर, कार्यस्थल और समाज—हर स्तर पर सम्मान, सुरक्षा और अवसर नहीं मिलते, तब तक संविधान की आत्मा अधूरी रहेगी।
आज की भारतीय महिला केवल अधिकारों की प्रतीक्षा नहीं कर रही—वह उन्हें हासिल करने के लिए संघर्ष भी कर रही है। यही संघर्ष आने वाले भारत को अधिक न्यायपूर्ण, समान और मानवीय बनाएगा।




