दवा भी महंगी, अब सिर्फ दुआ कीजिए
मेराज उद्दीन सिद्दीकी| Mulknama Daily|
1 अप्रैल 2026 से देश में एक और “हल्की” महंगाई दस्तक देने जा रही है। हल्की इसलिए, क्योंकि आंकड़ों में यह सिर्फ 0.6% की बढ़ोतरी है, लेकिन असर ऐसा होगा कि आम आदमी को फिर से अपनी जेब टटोलनी पड़ेगी। सरकार ने आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (NLEM) में शामिल दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी की अनुमति दे दी है।
इस फैसले के बाद पेरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और अन्य जरूरी दवाएं महंगी हो जाएंगी। यानी अब बुखार भी सोच-समझकर आएगा और खांसी भी बजट देखकर होगी।
सरकार का तर्क है कि यह बढ़ोतरी बहुत मामूली है और इससे फार्मा कंपनियों को लागत बढ़ने के दबाव से राहत मिलेगी। लेकिन सवाल यह है कि आम आदमी की राहत का क्या? जो पहले से ही महंगाई की कई परतों के नीचे दबा हुआ है, उसके लिए यह 0.6% भी कम नहीं है। क्योंकि यह सिर्फ दवाओं की कीमत नहीं बढ़ती, बल्कि इसके साथ बढ़ता है इलाज का कुल खर्च।
यह बढ़ोतरी 1000 से ज्यादा आवश्यक दवाओं पर लागू होगी। यानी वे दवाएं जो रोजमर्रा की जरूरत का हिस्सा हैं — बुखार, दर्द, संक्रमण, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज जैसी बीमारियों की दवाएं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि अब बीमारी से ज्यादा डर इलाज के खर्च से लगने लगा है।
बात समझे तो यह बढ़ोतरी इतनी “छोटी” है कि शायद सरकारी फाइलों में भी इसे ढूंढना मुश्किल हो। लेकिन जब यही “छोटी” बढ़ोतरी लाखों मरीजों पर लागू होती है, तो इसका असर बहुत बड़ा हो जाता है। जैसे चाय में चीनी एक चम्मच ज्यादा डालने से फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अगर हर दिन यही होता रहे तो महीने का हिसाब बदल जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि NLEM की दवाओं की कीमतें हर साल थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार पर तय होती हैं। इस बार WPI के हिसाब से 0.6% की बढ़ोतरी तय की गई है। तकनीकी रूप से यह एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन आम आदमी के लिए यह एक और झटका है।
दिलचस्प बात यह है कि जब भी कीमतें बढ़ती हैं, तो उसे “जरूरी” बताया जाता है। और जब कीमतें कम होती हैं, तो वह “संभव नहीं” होती। यानी महंगाई हमेशा अनिवार्य है और राहत हमेशा विकल्प।
स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले कुछ लोगों का मानना है कि यह बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं है और इससे दवाओं की उपलब्धता बनी रहेगी। उनका तर्क है कि अगर कंपनियों को उचित मुनाफा नहीं मिलेगा, तो वे उत्पादन कम कर सकती हैं, जिससे दवाओं की कमी हो सकती है।
यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है, लेकिन आम आदमी के लिए यह समझना मुश्किल है कि हर बार संतुलन उसी की जेब से क्यों बनाया जाता है।
एक आम मरीज के नजरिए से देखें तो यह बढ़ोतरी सिर्फ दवा की कीमत नहीं बढ़ाती, बल्कि उसके मानसिक तनाव को भी बढ़ाती है। पहले ही इलाज के खर्च, डॉक्टर की फीस, जांच और अस्पताल के बिल से परेशान लोग अब दवाओं के बढ़े हुए दाम भी झेलेंगे।
ग्रामीण इलाकों में इसका असर और ज्यादा देखने को मिलेगा, जहां लोग पहले से ही सीमित संसाधनों में इलाज कराते हैं। कई बार तो लोग दवा की पूरी खुराक भी नहीं ले पाते, जिससे बीमारी और गंभीर हो जाती है। ऐसे में यह बढ़ोतरी स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और चुनौती बन सकती है।
सोशल मीडिया पर भी इस खबर को लेकर प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। कुछ लोग इसे “एप्रिल फूल” से जोड़कर देख रहे हैं, तो कुछ इसे सरकार की मजबूरी बता रहे हैं। लेकिन ज्यादातर लोगों की चिंता एक ही है — आखिर आम आदमी कब तक हर फैसले का बोझ उठाता रहेगा?
डॉक्टर के पास जाने से पहले मरीज को यह सोचना होगा कि बीमारी कितनी गंभीर है और बजट कितना हल्का। शायद आने वाले समय में डॉक्टर भी यह सलाह दें — “अगर बहुत जरूरी हो तभी दवा लें, वरना आराम कर लें।”
हालांकि सरकार का कहना है कि वह आम जनता के स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशील है और यह बढ़ोतरी बहुत सीमित है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जब रोजमर्रा की जरूरत की चीजें महंगी होती हैं, तो उसका असर सीधे जीवन स्तर पर पड़ता है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी बात यह है कि स्वास्थ्य एक बुनियादी जरूरत है, कोई विलासिता नहीं। और जब इसी पर खर्च बढ़ता है, तो यह सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक चिंता का विषय बन जाता है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि 0.6% की यह बढ़ोतरी भले ही आंकड़ों में छोटी लगे, लेकिन आम आदमी के लिए यह एक और याद दिलाने वाला संकेत है कि महंगाई अब जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। और शायद यही नया सामान्य है — जहां दवा भी महंगी है और दर्द भी।




