कुत्ता काटे तो सरकार काटेगी चेक!
व्यंग्यकार| मेराज उद्दीन सिद्दीकी|
देश में अब कुत्ते केवल वफादारी के प्रतीक नहीं रहे, बल्कि राज्य सरकारों के लिए संभावित वित्तीय खतरा बन चुके हैं। वजह है सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक आदेश, जिसने आवारा कुत्तों के काटने पर मुआवजे की जिम्मेदारी सीधे राज्य सरकारों के कंधों पर डाल दी है। अब अगर किसी गली में कुत्ता भौंकता नहीं, बल्कि काट लेता है, तो पीड़ित को अस्पताल के साथ-साथ सचिवालय की याद भी आ सकती है।
अदालत ने साफ कहा है कि यदि बच्चे या बुजुर्ग कुत्ते के हमले में घायल होते हैं या उनकी मृत्यु होती है, तो इसे “दैवीय आपदा” नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही माना जाएगा। यानी अब यह बहाना नहीं चलेगा कि “कुत्ता तो कुत्ता ही होता है”।
🐕 कुत्ता बनाम सिस्टम
देश की सड़कों पर घूमते लाखों आवारा कुत्ते वर्षों से प्रशासन की आंखों में सिर्फ आंकड़ों की धुंध बने हुए थे। नसबंदी योजनाएं फाइलों में भौंकती रहीं और ज़मीन पर कुत्ते खुलेआम दौड़ते रहे। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही मुआवजे का डंडा उठाया, फाइलें खुद-ब-खुद टेबल पर आने लगी हैं।
लगता है अधिकारियों में खलबली है—
“अगर हर काटने पर मुआवजा देना पड़ा तो बजट में ‘डॉग हेड’ अलग से खोलना पड़ेगा।”
कुछ राज्यों में तो यह चर्चा भी शुरू हो सकती है कि क्या कुत्तों की जनगणना कराई जाए, ताकि भविष्य के दावों का अनुमान लगाया जा सके।
🧒👴 बच्चे, बुजुर्ग और जिम्मेदारी
अदालत की सबसे सख्त टिप्पणी बच्चों और बुजुर्गों को लेकर आई। जजों ने कहा कि जो समाज अपने सबसे कमजोर वर्ग को सुरक्षित नहीं रख सकता, वह विकास के दावे कैसे कर सकता है?
अब सवाल यह है कि क्या नगर निगम स्कूलों की तरह “डॉग-सेफ ज़ोन” बनाएंगे?
क्या पार्कों के बाहर बोर्ड लगेंगे—
“कृपया सावधान रहें, यह क्षेत्र सरकार की जिम्मेदारी में आता है”?
💉 नसबंदी से मुआवजे तक का सफर
अब तक सरकारी रणनीति थी—
“कुत्ते बढ़ रहे हैं? नसबंदी कराओ।”
लेकिन जमीन पर हकीकत यह रही कि कुत्ते बढ़ते गए और फाइलें पतली होती गईं।
अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद रणनीति बदली हुई दिखती है—
“कुत्ता काटे? पहले मुआवजा दो, फिर मीटिंग बुलाओ।”
शायद कुछ नगर निगमों ने तो आंतरिक तौर पर यह भी कहना शुरू कर दिया हो कि
“कुत्ते के काटने का केस दर्ज होगा या FIR में ‘अज्ञात आरोपी’ लिखा जाएगा?”
🧾 मुआवजा—दर्द का हिसाब?
सबसे बड़ा सवाल यही है—दर्द का मुआवजा कितना?
क्या एक काटने की कीमत तय होगी?
क्या पंजे के निशान गिने जाएंगे?
और अगर कुत्ता सरकारी दफ्तर के बाहर काटे, तो क्या उसे “ड्यूटी के दौरान हुई घटना” माना जाएगा?
कुछ मनमोजियो का कहना है कि अगला कदम यह हो सकता है कि
कुत्तों के लिए ID कार्ड और
नगर निगम के लिए बीमा पॉलिसी लाई जाए।
🏛️ प्रशासन की नींद टूटी
इस फैसले ने साफ कर दिया है कि आवारा कुत्तों की समस्या सिर्फ पशु-प्रेम या पशु-विरोध का मुद्दा नहीं, बल्कि सुशासन और जवाबदेही का सवाल है।
अब तक जो जिम्मेदारी “कुत्ते की फितरत” पर डाली जाती थी, वह अब सरकार की फाइलों पर लिखी जाएगी।
✍️ व्यंग्य में सच्चाई
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश सिर्फ मुआवजे का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने का फैसला है।
कुत्ते तो काटते रहेंगे, यह उनकी प्रकृति है—
लेकिन अब सवाल यह है कि क्या सरकारें अपनी प्रकृति बदलेंगी?
या फिर आने वाले समय में हम यह खबर पढ़ेंगे—
“बजट पेश, कुत्ता काट मुआवजा मद में भारी कटौती”।





One Comment
सुजीत द्विवेदी
Very strong comments are appreciated. Really this a matter of mass level activity today. .If supreme court is taking seriously to this matter, , now it’s a great responsibility of Municipal corporation of india.
Very good presentation. .