नवाब आसफुद्दौला के रोज़गार मॉडल से ‘न्यू इंडिया’ में कोई सीख ली जा सकती है?
✍️ लेखक: कृष्ण प्रताप सिंह
📌 साभार: The Wire Hindi द वायर
विचार / विशेष | 04/02/2026
1784 में भीषण अकाल के वक़्त अवध सूबे के नवाब आसफुद्दौला की हुकूमत ने लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए जो क़दम उठाए, उनके तहत मनरेगा की ही तर्ज पर उनसे काम लेकर मेहनताना कहें या मजदूरी दी जाती थी. इसने उस दुस्सह अकाल के दौरान जहां बड़ी संख्या में लोगों को भूखे मरने से बचाया, वहीं उनके आत्मसम्मान सम्मान की भी रक्षा की.

नवाब आसफुद्दौला (1775-1797) (फोटो साभार: Google Arts)
जब भी किसी बजट में आम लोगों के रोजी-रोज़गार से जुड़े सवालों की अनसुनी की जाती है या उनको ठीक से संबोधित नहीं किया जाता और सरकार सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के अपने दावों पर गर्व करती हुई इस तथ्य की उपेक्षा कर देती है कि कथित जीडीपी वृद्धि के अनुपात में नए रोज़गार पैदा नहीं हो रहे और रोज़गारहीन विकास की स्थिति है, तो कम से कम अवध के जानकारों को तो सूबे के नवाब आसफउद्दौला (26 जनवरी, 1775 – 21 सितंबर, 1797) द्वारा 1784 में भीषण अकाल के वक्त लागू किए गए बेहद सफल बताए जाते रोज़गार मॉडल की याद आती ही आती है.
नरेंद्र मोदी सरकार के ताज़ा बजट के वक्त यह याद कुछ और ‘स्वाभाविक’ हो चली है तो इसके दो बड़े कारण हैं. पहला यह कि इस सरकार ने बजट से पहले ही, दो से ज्यादा दशकों से लागू देश की सबसे बड़ी और प्रभावी रोज़गार योजना मनरेगा का नाम और स्वरूप दोनों बदल डाले. इससे वह ऐसे झमेले में फंस गई कि उसके तहत दी जा रही काम की गारंटी का कोई मतलब ही नहीं रह गया और विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस अभी भी उसे बचाने के लिए संघर्ष कर रही है.
दूसरा कारण यह कि ताज़ा बजट भी रोज़गार सृजन के लिहाज से कोई बड़ी उम्मीद नहीं जगाता.
क्या आश्चर्य कि यह ख़याल आए कि अगर आसफउद्दौला की राजतंत्र का अंग रही हुकूमत अपने समय में रोज़गार का वैसा सर्वस्वीकार्य मॉडल ला सकती थी तो लोकतंत्र के रास्ते चुनकर आई नरेंद्र मोदी की सरकार को उससे कुछ भी सीखने या उस राह पर एक भी कदम चलने तक से परहेज़ क्यों है? क्या इसलिए कि उक्त रोज़गार मॉडल की मायनों में उस मनरेगा जैसा ही था, मोदी सरकार ने जिसे बेवजह अपनी खुन्नसों व पूर्वाग्रहों का शिकार बना डाला?
प्रसंगवश, आसफुद्दौला की हुकूमत ने उस अकाल के वक्त लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए जो कदम उठाए, उनके तहत मनरेगा की ही तर्ज पर उनसे काम लेकर मेहनताना कहें या मजदूरी दी जाती थी.
हां, उसने इन कदमों में अकुशल मजदूरों को ही नहीं हुनरमंदों, कारीगरों, कलाकारों, लेखकों, शायरों व किस्सागो वगैरह को भी शामिल कर उनको ज्यादा समावेशी बना दिया था. गौर करने की बात यह भी है कि उसने ऐसा तब किया था, जब उस पर लोकतांत्रिक या कल्याणकारी होने का कोई दबाव नहीं था.
दरअसल, वह लोकतंत्र का दौर ही नहीं था. न ही आधुनिक जीवन मूल्यों का. इसके बावजूद ये कदम कल्याणकारी भी थे और टिकाऊ विकास के कारक भी. इस अर्थ में टिकाऊ कि उनके तहत बड़े पैमाने पर चले सार्वजनिक निर्माणों के अभियान के तहत जो इमारतें तामीर कराई गईं, वे अभी तक खड़ी हैं.
इतिहास गवाह है कि इन कदमों ने उस दुस्सह अकाल के दौरान जहां बड़ी संख्या में लोगों को भूखे मरने से बचाया, वहीं उनके आत्मसम्मान सम्मान की भी रक्षा की. इसलिए कुछ जानकार उन्हें ‘सम्मान के साथ रोज़गार का मॉडल’ भी कहते हैं, जिसमें न खैरात बांटने या मुफ़्त सहायता देने जैसी कोई बात थी, न ही हुकूमत को दान के चौरे पर बैठाने पर.
खैरात बनाम खुद्दारी
बताते हैं कि अकाल ने सूबे में विकट हालात पैदा कर दिए तो आसफउद्दौला ने अपने वजीर-ए-आला हैदरबेग और दीवान राजा टिकैत राय से रियाया को भूखों मरने से बचाने को लेकर सलाह-मशवरा शुरू किया. उसमें सुझाव आया कि खजाने का मुंह खोलकर लोगों को खुले हाथों खैरात दी जाए.
लेकिन इसमें एक बड़ी बाधा यह थी कि सूबे में ऐसे ‘मानिंद और खुद्दार’ लोगों की भी बड़ी संख्या थी, जिनको खैरात पर जीने के बजाय मर जाना बेहतर लगता था. वे मर जाते लेकिन खैरात लेकर अपनी ही नजरों में गिरना स्वीकार नहीं करते, जबकि हुकूमत को इसका भी ख्याल रखना था कि कोई लाज का मारा शहरी घर में बैठा भूखों न मर जाए.
फलस्वरूप तय किया गया कि ऐसी इमारतें बनवाई जाएं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों को काम और उसके बदले में मेहनताना मिल सके. इस मकसद से प्रसिद्ध वास्तुकार किफायतउल्ला की देखरेख में इमामबाड़ा और उससे जुड़ी भूल-भुलैया का निर्माण आरंभ कराया गया. लेकिन अकाल इतना विकराल था कि इससे सृजित रोज़गार ऊंट के मुंह में जीरा भर ही सिद्ध हुए.
तब रूमी दरवाजे का निर्माण शुरू कराकर उसे दिन-रात लगातार चलाया गया. रात की पाली में उन लोगों को काम पर लगाया जाता था, जो अपनी ‘मानिंद’ वाली विशिष्ट सामाजिक स्थिति के कारण दिन के उजाले में काम करने नहीं आ सकते थे, क्योंकि उनको इसमें अपनी हेठी महसूस होती थी.
कहते तो यहां तक हैं कि कई बार वे रात में आते और कोई और काम नहीं होता तो दिन में हुए निर्माण को ढहाने के काम में लगा दिए जाते थे. अलबत्ता, ढहाने का यह काम वे प्रतीकात्मक रूप से ही करते थे. इस तरह उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी बची रहती थी और वे अकाल के कहर से भी बच जाते थे.
चूंकि दिन में निर्माण करने वाले ज्यादा थे और रात में प्रतीकात्मक रूप से उसे ढहाने वाले कम, इसी राह पर चलते हुए बड़े व छोटे इमामबाड़ों के बीच साठ फुट ऊंचा रूमी दरवाजा बना, जो और आज भी अवस्थित है . उन दिनों लखनऊ में रहने वाले यूरोपियन उसे ‘टर्किश गेट वे’ कहते थे, जबकि आज की तारीख में उसे पुराने लखनऊ का प्रवेश द्वार कहा और बहुत से अवसरों पर लखनऊ के ‘लोगो’ यानी पहचान के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.
जानना दिलचस्प है कि यह दरवाजा रोमन, बाइजेंटाइन और उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्यों की अपने वक्त की विश्वप्रसिद्ध राजधानी कुस्तुंतुनिया (जो कभी यूरोपीय पुनर्जागरण का महत्वपूर्ण केंद्र थी और अब इस्तांबुल नाम से तुर्किये का प्रमुख शहर है) के उस सबलाइम पोर्ट (ग्रांड गेट) की प्रतिकृति है, जो अब अस्तित्व में नहीं है.
अकाल से निपटने की तैयारी कितनी दीर्घकालिक थी, इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि वह 1784 में आया था, जबकि उससे निपटने के लिए रोज़गार सृजन हेतु शुरू कराए गए कुछ निर्माण 1791 तक चलते रहे थे. इससे न सिर्फ लखनवी बल्कि समूचे अवध सूबे के लोग बहुत खुश थे.
कोई कहता था कि आसफउद्दौला ने अपनी रियाया के लिए अपना दिल और तिजोरी दोनों खोल दी हैं, जबकि कोई कहावत कहता था: ‘जिसको न दे मौला, उसको दे आसफउद्दौला.’
दूसरा पहलू
लेकिन स्थिति का दूसरा पहलू भी है. आसफुद्दौला के आलोचकों के अनुसार इस रोज़गार मॉडल के पीछे उनकी सदाशयता नहीं बल्कि वह विवशता थी, जिसके चलते उस वक्त उनके समक्ष एक ओर कुंआ तो दूसरी ओर खाई की स्थिति बन गई थी.
उनकी हुकूमत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का दबाव बढ़ता जा रहा था और वे उसको बचाने के विकट संकट का सामना कर रहे थे. ऐसे में अकाल पीड़ित रियाया का थोड़ा भी असंतोष उन पर भारी पड़ सकता था और ईस्ट इंडिया कंपनी उनकी ‘नकेल’ और कस सकती थी. इसलिए उन्होंने अपनी विलासी प्रवृत्ति के बावजूद अकाल राहत का बहुत अच्छा प्रबंधन किया.
इतिहासकारों के अनुसार, 1775 में पिता शुजाउद्दौला के निधन के बाद उनके नवाब बनते ही कंपनी ने उनको फैजाबाद की संधि (जिसे बनारस की दूसरी संधि भी कहा जाता है) के लिए मजबूर कर उनके कोढ़ में खाज पैदा कर दिया था.
यह तो सुविदित ही है कि इससे पहले कंपनी ने 22-23 अक्टूबर,1764 को लड़ी गई बक्सर की ऐतिहासिक लड़ाई जीतने के बाद शुजाउद्दौला को युद्ध अपराधी करार देकर उनसे भारी जुर्माना वसूला था और उन पर बस इतना रहम किया था कि उनकी नवाबी उनके पास रहने दी थी.
लेकिन फैजाबाद की संधि के तहत उसने आसफुद्दौला से बनारस का क्षेत्र तो ले ही लिया, उनके राजपाट की सुरक्षा के नाम पर उनके खर्च पर उनकी ही राजधानी में रखी गई ब्रिटिश सेना का शुजा के समय से कंपनी को दिया जा रहा खर्च भी बहुत बढ़ा दिया. यह संधि एकतरफा तौर पर कंपनी के पक्ष में इतनी झुकी हुई थी कि 1781 में बनारस के राजा चैत सिंह ने इसके विरुद्ध विद्रोह तक कर दिया था.
साफ है कि अकाल से सामना हुआ तो इस संधि के तहत कंपनी को भारी भुगतानों के चलते आसफुद्दौला के खजाने की हालत बहुत अच्छी नहीं थी. इसके बावजूद उन्होंने अपनी रियाया को बेसहारा या कंपनी के रहमो-करम पर नहीं छोड़ा और बड़े सार्वजनिक निर्माणों के लिए धन जुटाकर उसे सम्मान के साथ रोज़गार उपलब्ध कराया.
यों जुटाया धन
कई इतिहासकार यह भी कहते हैं कि उन्होंने अपनी मां (बहू बेगम), जिनसे उनकी एकदम नहीं बनती थी, और दादी (नवाब बेगम) से ‘मुक्त’ होने के लिए उन्होंने उनको फैजाबाद में छोड़कर अपनी राजधानी लखनऊ स्थानांतरित की तो लखनऊ में बड़े पैमाने पर इमारतों का निर्माण कराना वैसे भी उनके लिए बहुत जरूरी था.
ऐसे में उन्होंने अकाल पीड़ितों के प्रति जो हमदर्दी दिखाई, वह अपनी हुकूमत को नई जगह स्थापित करने और स्थानीय लोगों की वफादारी हासिल करने की रणनीति भर थी. उनको इसका लाभ इस रूप में मिला कि उनके विरुद्ध किसी भी बगावत की आशंका अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई.
हां, संकट की उस घड़ी में भी उन्होंने लखनऊ को कला और वास्तुकला का केंद्र बनाकर कमजोर होती मुगल सत्ता और चढ़ती चली चली आ रही ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने सूबे की ‘शक्ति’ की बाबत स्पष्ट संदेश दिया.
उनका रोज़गार मॉडल यह संदेश देने में उनका सहायक बना और वे रियाया की नजरों में मुगलों व अंग्रेजों से कहीं बड़े रक्षक साबित हो गए. इसीलिए उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारी आर्थिक शोषण के बावजूद जैसे भी संभव हुआ, धन की व्यवस्था कर इस मॉडल को जारी रखा.
उन्होंने कंपनी द्वारा नियुक्त बंगाल के तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को अकाल की विभीषिका की बाबत समझाया तो उसने कंपनी को देय रकम में 50 लाख रुपये की कमी कर दी. उन दिनों यह बड़ी रकम हुआ करती थी.
इसके अतिरिक्त दीवान टिकैत राय द्वारा दी गई गैर-जरूरी खर्च रोकने की सलाह पर अमल करते हुए उन्होंने उनमें से कुछ को हमेशा के लिए बंद करा दिया तो कुछ को कुछ समय के लिए रोक दिया था. यहां तक कि उन्होंने अपने संग्रहालय की शोभा बढ़ाने के लिए दुनिया भर से एक से एक नायाब बेशकीमती वस्तुएं खरीदने की लत से भी निजात पा ली थी.
लेकिन इस अकाल से सालों पहले उन्होंने वारेन हेस्टिंग्स के साथ मिलकर जिस तरह फैजाबाद में रह रही अपनी मां और दादी पर चढ़ाई करके उनसे जबरन धनउगाही की थी, उसके लिए उनको अरसे तक भरपूर निंदाएं व लानतें भी झेलनी पड़ी थीं.
✍️ लेखक: कृष्ण प्रताप सिंह
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