प. बंगाल : घुसपैठ का मुद्दा और वोट बैंक बनाने की रणनीति
आलेख : स्वर्णेंदु दत्ता | बांग्ला से अनुवाद : संजय पराते
पश्चिम बंगाल में बहुचर्चित एसआईआर (SIR) प्रक्रिया के बाद चुनाव आयोग को प्रदेश में एक भी बांग्लादेशी घुसपैठिया नहीं मिला। इसके बाद भी गृह मंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में आकर कहा कि प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव घुसपैठियों को खदेड़ने और घुसपैठ रोकने के मुद्दे पर होगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि बंगाल की पूरी जनता घुसपैठ की समस्या से तंग आ चुकी है। पश्चिम बंगाल के वोटों पर बांग्लादेशी घुसपैठियों यानी अवैध रूप से बांग्लादेश से आए मुसलमानों का नियंत्रण है। यह कोई नई टिप्पणी नहीं है। राज्य के लोगों को आरएसएस के इस एजेंडे पर राज्य में वाम मोर्चा सरकार के दौरान संसद में ममता बनर्जी का हंगामा याद है।
जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है, हिंदुत्ववादियों ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मकसद से पश्चिम बंगाल में घुसपैठ के मुद्दे को तरह-तरह से पेश किया है। उनके बयान का सार यह है कि राज्य सरकार के समर्थन से मुसलमान अवैध रूप से बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में प्रवेश कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, राज्य की जनसंख्या की संरचना (जनसांख्यिकी) बदल रही है। पश्चिम बंगाल ‘पश्चिम बांग्लादेश’ बनता जा रहा है। कुछ समय बाद यहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे, आदि-इत्यादि।
घुसपैठ पर ऐसी टिप्पणियों का उद्देश्य बहुसंख्यक हिंदुओं के मन में मुसलमानों के प्रति डर पैदा करना है, ताकि असुरक्षा की भावना बनी रहे। पश्चिम बंगाल में पिछले विधानसभा चुनाव से पहले सीएए-एनआरसी के मुद्दे पर प्रचार करते समय भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा था कि राज्य में एक करोड़ अवैध मुस्लिम अप्रवासी हैं। इस बार एसआईआर के दौरान प्रदेश भाजपा नेताओं ने कहा कि राज्य में एक करोड़ रोहिंग्या-बांग्लादेशी हैं।
बूथ स्तर पर काम करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं ने कहा, “हम तभी जीतेंगे, जब एसआईआर में घुसपैठियों को खत्म कर दिया जाएगा।” दूसरे शब्दों में कहें, तो भाजपा नेता ऐसा कहकर निचले स्तर के कार्यकर्ताओं को एकजुट करना चाहते थे। हालाँकि, मसौदा सूची से उन्हें निराशा ही हुई होगी। परिणामस्वरूप, केन्द्रीय गृह मंत्री को इस मुद्दे को पुनर्जीवित करना पड़ा है।
अमित शाह ने दावा किया है कि उनकी सरकार आने के बाद असम-त्रिपुरा में घुसपैठ बंद हो गई है। लेकिन उनके मंत्रालय की जानकारी ऐसा नहीं कहती। कोई यह दावा नहीं करता कि सीमावर्ती पश्चिम बंगाल में कोई घुसपैठ नहीं हुई है। कोई यह दावा नहीं करता कि गहरे भ्रष्टाचार में डूबे निचले स्तर के तृणमूल कार्यकर्ता किसी के लिए दस्तावेज़ नहीं बनाते हैं। लेकिन क्या पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की इतनी बड़ी आबादी है कि वे चुनाव का नतीजा बदल सकते हैं?
इस पर चर्चा करने से पहले एक और महत्वपूर्ण बात यह समझनी चाहिए कि अवैध घुसपैठ को रोकने के लिए सीमा की सुरक्षा करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है। तो अगर बांग्लादेश से अवैध प्रवेश जारी है, तो क्या केंद्र की मोदी सरकार सीमा की रक्षा करने में विफल नहीं हो रही है?
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसे ही एक सवाल पर अमित शाह अपना आपा खो बैठे थे। तब उन्होंने यह विचित्र दावा किया था कि पश्चिम बंगाल की स्थिति को दिल्ली के रायसीना में बैठकर नहीं समझा जा सकता! यानी पश्चिम बंगाल की स्थिति को समझने के लिए उन्हें राज्य की सत्ता में बिठाया जाना चाहिए!
मोदी सरकार ने कोविड का बहाना बनाकर वर्ष 2021 में जनगणना नहीं कराई। जनगणना के अभाव में संघ-भाजपा और उनके आईटी सेल जनसंख्या, हिंदू-मुस्लिम अनुपात, मुस्लिम प्रजनन दर आदि के बारे में मनगढ़ंत जानकारी देकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। 10 अक्टूबर को गृह मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में ‘घुसपैठ, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और लोकतंत्र’ पर भाषण दिया था। अपने लंबे भाषण में अमित शाह ने कहा कि गुजरात, राजस्थान भी सीमावर्ती राज्य हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल वोट बैंक की राजनीति के लिए घुसपैठियों का केंद्र है। यह बिल्कुल वही तर्क है, जो ममता बनर्जी ने भाजपा के साथ गठबंधन के दौर में दिया था कि माकपा ने वोट बैंक की राजनीति के लिए घुसपैठ को बढ़ावा दिया।
अपने भाषण में, अमित शाह ने यह महत्वपूर्ण दावा किया कि 1951 से 2011 तक की जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि घुसपैठ के कारण ही विभिन्न धर्मों की जनसंख्या वृद्धि के संतुलन में अंतर आया है। अमित शाह ने कहा, 1951 में हिंदू आबादी 84%, मुस्लिम 9.8% थी। 2011 में यह क्रमशः 79% और 14.2% थी। उनका दावा है कि भारत में हिंदू आबादी में गिरावट और मुस्लिम आबादी में वृद्धि प्रजनन दर के कारण नहीं, बल्कि मुस्लिमों के घुसपैठ के कारण है, क्योंकि भारत में मुस्लिमों की प्रजनन दर ज्यादा नहीं है।
यदि पश्चिम बंगाल में वास्तव में बड़े पैमाने पर घुसपैठ हुई होती, तो प्रति दशक के आधार पर राज्य की जनसंख्या की वृद्धि दर भारत की औसत वृद्धि से अधिक होती। लेकिन आँकड़े ऐसा नहीं कहते। 1951 से 1961 तक पश्चिम बंगाल की जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक थी। 1961-71 तक इसमें कमी आई और यह राष्ट्रीय औसत के करीब आ गया।
1981 के बाद से, पश्चिम बंगाल की जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कम रही है। 2011 की जनगणना में राष्ट्रीय औसत 17.7% था, जबकि पश्चिम बंगाल में यह 13.9% था। अगर मुस्लिम बांग्लादेश से यहां आते, तो यह संभव नहीं होता।
(RSS) संघ-भाजपा के व्हाट्सएप मैसेज और वीडियो अभियानों में लगातार यह दावा किया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल पर मुस्लिम घुसपैठियों का कब्जा हो रहा है। 2001 और 2011 की जनगणना रिपोर्ट के जिलावार विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि यह दावा गलत है। ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका (2021) के अनुसार सीमावर्ती नादिया जिले में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की वृद्धि दर राज्य के औसत से कम है। वहीं सीमावर्ती न होने के बावजूद पुरुलिया में दोनों समुदायों की वृद्धि दर अधिक है। इससे स्पष्ट है कि बड़े पैमाने पर घुसपैठ का दावा तथ्यात्मक नहीं है।
राम मंदिर, धारा 370, तीन तलाक जैसे मुद्दे अब भाजपा के हाथ से निकल चुके हैं। इसलिए ‘घुसपैठ’ को दीर्घकालिक राजनीतिक एजेंडे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। बेरोजगारी, महंगाई, निवेश की कमी, शिक्षा-स्वास्थ्य की बदहाली, महिला सुरक्षा जैसे असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए यह रणनीति अपनाई जा रही है।
इस प्रकार एक समुदाय के लोगों में दूसरे समुदाय के प्रति असुरक्षा और नफरत पैदा की जा रही है, जिससे स्थायी सांप्रदायिक वोट बैंक तैयार हो रहा है। यही कारण है कि ‘घुसपैठ’ का मुद्दा महज सुरक्षा नहीं, बल्कि सोची-समझी वोट बैंक बनाने की रणनीति है।
(लेखक बांग्ला दैनिक ‘गणशक्ति’ के संवाददाता हैं।
अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)
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