“सफर सुरक्षित है” — बस के पोस्टर पर लिखा था, हकीकत अंदर चीख रही थी!
Delhi | Mulknama Daily|
देश की राजधानी Delhi में एक बार फिर इंसानियत को शर्मिंदा करने वाली घटना सामने आई। स्लीपर बस, जिसे लोग लंबी दूरी का आरामदायक सफर समझकर चुनते हैं, वही एक महिला के लिए चलती हुई दहशतगाह बन गई।
आरोप है कि बस के ड्राइवर सुदेश और कंडक्टर अमन ने महिला के साथ गैंगरेप किया। पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर बस को सीज कर दिया है।
हालात यह है कि देश में हर दूसरे दिन “नारी सुरक्षा”, “बेटी बचाओ”, “महिला सम्मान” के बड़े-बड़े भाषण सुनाई देते हैं। बसों पर हेल्पलाइन नंबर चमकते हैं, विज्ञापनों में मुस्कुराती महिलाएं दिखती हैं, और मंचों से नेता/मंत्री सुरक्षा के दावे बरसाते हैं। मगर जब रात गहराती है, तब अक्सर कानून के पोस्टर सो जाते हैं और दरिंदगी जाग जाती है।
दिल्ली कहने को नेशनल कैपिटल “स्मार्ट सिटी” है। कैमरे हैं, ऐप हैं, GPS है, पुलिस पेट्रोलिंग है, लेकिन अपराधियों के हौसले इतने “स्मार्ट” हो चुके हैं कि उन्हें शायद पता है — घटना के बाद कुछ दिन शोर होगा, टीवी डिबेट होगी, सोशल मीडिया पर गुस्सा निकलेगा, फिर सब सामान्य हो जाएगा।
सबसे बड़ा सिस्टम का फेल्यर यह है कि महिलाओं को आज भी सफर से पहले यह सोचना पड़ता है कि सीट कौन-सी लें, रात में यात्रा करें या नहीं, फोन ऑन रखें, किसी को लाइव लोकेशन भेजें, और जरूरत पड़े तो आत्मरक्षा भी करें। यानी जिम्मेदारी अपराधियों पर कम, महिलाओं पर ज्यादा डाल दी गई है।
बस सीज हो गई, आरोपी गिरफ्तार हो गए — यह कानून की प्रक्रिया है और होनी भी चाहिए। लेकिन सवाल वही पुराना है:
क्या हर घटना के बाद सिर्फ गिरफ्तारी ही “न्याय” का नया पर्याय बन चुकी है?
समाज की हालत ऐसी हो गई है कि लोग खबर पढ़कर कुछ सेकंड दुख जताते हैं, फिर अगले रील पर स्क्रॉल कर देते हैं। संवेदनाएं भी अब इंटरनेट डेटा की तरह सीमित लगने लगी हैं।
यह रिपोर्ट किसी राजनीति पर नहीं, उस सड़ी हुई सामाजिक/धार्मिक/सांस्कृतिक/क्षेत्रीय मानसिकता पर सवाल है जो महिला को इंसान नहीं, मौका समझती है। और उससे भी बड़ा सवाल उस व्यवस्था पर है जो हर घटना के बाद सिर्फ प्रेस नोट जारी करती है — मानो अपराध नहीं, कोई नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया हुई हो।
देश में बसें चल रही हैं, भाषण चल रहे हैं,चुनाव चल रहे थे और अब शपथ समारोह और विभिन्न अभियान चल रहे हैं…
बस अगर कुछ नहीं चल रहा, तो वह है महिलाओं का निडर होकर सुरक्षित सफर।
“याद रखना हमारी कड़वी सच्चाई यह है कि 8 दिन से 80 साल तक की कोई लड़की/महिला सुरक्षित नहीं है”
माफ कीजियेगा शायद ज्यादा भावुक हो गया इस रिपोर्ट को लिखते लिखते! क्षमा प्रार्थी हूं, आपसे नहीं हमारे समाज की सभी महिलाओं से। जय हिंद
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